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Train 18 - तेरी प्यारी प्यारी Livery को किसी की नज़र न लगे

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News Entry# 414075
रेलवे बोर्ड ने आदेश जारी किए थे कि रेलवे के खाली पड़े पदों को सरेंडर किया जाये और नए पद न बनाये जाएँ, इस दिशा में जोनल रेलवे ने कार्य करना शुरू कर दिया है। उल्लेखनीय है कि कोरोना के संकट के कारण 24 मार्च से सभी रेल गाड़ियां स्थगित हैं और रेलवे की आय कम हो गयी है, नौबत यहाँ तक आ पहुंची है कि कर्मचारियों के वेतन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

रेलवे ने रोज नित नए नए आदेश जारी हो रहे हैं जिससे कर्मचारियों को अपना
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भविष्य अन्धकार में नजर आने लगा है। जहाँ एक और कर्मचारियों में रोष है कि उनकी संख्या में कटौती कर उनका काम बढ़ाने की कवायद चल रही है वहीँ उनमें रोष भी है कि अधिकारियों के पदों की संख्या जस की तस बरकरार है और इस बारे में रेलवे बोर्ड ने भी चुप्पी साध ली है।

दूसरी तरफ, अगले 2-3 साल में रेलवे के 3 लाख से अधिक लोग रिटायर होने वाले हैं। यदि रिक्त पदों की भर्ती नहीं की गई और लाखों की संख्या में कर्मचारी रिटायर हो  जाएंगे तो मौजूदा कर्मचारियों पर वर्क लोड बढ़ जाएगा। यह भी कहा जा रहा है कि रिक्त पदों को रद्द करना रेलवे के प्राइवेटाइजेशन प्लान का ही एक हिस्सा है। सरकार के इस फैसले से देश में बेरोजगारी और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

दक्षिण पूर्वी रेलवे  में 3687 पद रद्द रिक्त पदों को रद्द करने के सरकार के आदेश के तुरंत बाद दक्षिण पूर्वी रेलवे ने 50 फीसदी (करीब 3687) पद रद्द करते हुए संबंधित आदेश भी जारी कर दिया है। प्राइवेटाइजेशन के तहत रेलवे में कमर्शियल वर्क जैसे रिजर्वेशन, बुकिंग, टिकेट चेकिंग, इंजीनियरिंग, ऑफिस स्टॉफ जैसे विभागों के पद रद्द होने वाले हैं और सरकार उनके स्थान पर आउट सोर्सिंग कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकती है। हालांकि बोर्ड ने अगले नोटिस जारी होने तक सेफटी जोन के अंतर्गत आने वाले पदों को रद्द नहीं करने को कहा है।

सरकार के फैसले सेे बेरोजगारों का झटका

यह प्रक्रिया गत 1 जुलाई से शुरू हो चुकी है। सरकार के इस फैसले से केवल दक्षिण मध्य रेलवे में 4-5 हजार पद रद्द होने का खतरा है। ऐसे में रेलवे में नौकरी हासिल करने की उम्मीद लिए बैठे हजारों शिक्षित बेरोजगारों के लिए बड़ा झटका है।

गरीबों पर पड़ेगा निजीकरण का असर

उधर, रेलवे यूनियन सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इस आदेश को वापस लेने की मांग कर रहा है। रेलवे यूनियन की मानें तो अगले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे नहीं रहेगा और सबकुछ प्राइवेट हो जाएगा और उसका खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ेगा। हालांकि रेलवे यूनियन सरकार के इस फैसले के खिलाफ समय-समय पर प्रदर्शन और धरने देता रहा है। उसका कहना है कि रेलवे के निजीकरण के विरोध में केवल वही नहीं बल्कि जनता की भागीदारी जरूरी है और उसी लिए वह रेलवे के  निजीकरण के विरोध में लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहा है।

केवल डिमांड वाले मार्गों पर चलेंगी ट्रेनें यूनियन का कहना है कि अगर रेलवे का निजीकरण हो जाता है तो इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर देखने को मिलेगा। प्राइवेटाइजेशन के बाद ट्रेनें केवल उन्हीं मार्गों पर अधिक चलेंगी जिनकी अधिक डिमांड रहेगी । यही नहीं, ट्रेनें केवल उसी समय पर चलाई जाएंगी जब अधिक भीड़ होती है।  ऐसे में आम यात्री अपनी मर्जी के हिसाब से यात्रा तय नहीं कर सकेगा। इनसबके अलावा देश का सबसे सस्ता परिवहन सुविधा कही जाने वाली ट्रेन की यात्रा महंगी हो जाएगी और टिकट के दाम तय करने का अधिकार रेलवे के पास नहीं बल्कि प्राइवेट प्रबंधनों के हाथ में होगा और वे अपने मनमाने ढंग से दाम बढ़ा सकते हैं।

रेलवे यूनियन के महासचिव शिव गोपाल ने बताया कि देश में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। शिव गोपाल के मुताबिक गत फरवरी में देश में 10 फीसदी बेरोजगारी थी जो कोरोना महामारी की वजह से बढ़कर 40 फीसदी तक पहुंच गई है। ऐसे में सरकार का भारतीय रेलवे में रिक्त लाखों पदों को रद्द करने का फैसला लेना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यही नहीं, रिक्त पदों की भर्ती नहीं करने की  स्थिति में मौजूदा कर्मचारियों का वर्क लोड़ बढ़ जाएगा और इसका असर सीधे उनके काम की  गुणवत्ता पर पड़ती है।

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Category: News

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