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Blog Entry# 1976666  
Posted: Aug 30 2016 (21:48)

7 Responses
Last Response: Aug 31 2016 (12:47)
  
भारत मेंस्पेनिश कंपनी टैल्गो की हाई स्पीड ट्रेनों के ट्रायल चल रहे हैं, जिन्हें सफल माना जा रहा है। हालांकि, इस माह के शुरू में चौथा और अंतिम ट्रायल अचानक रोक दिया गया। एक वजह बारिश की दी गई है तो यह भी कहा जा रहा है कि स्पेन की टीम विश्राम चाहती थी। जो भी कारण रहा हो अब निर्णायक ट्रायल सितंबर में होने की संभावना है। अब तक आजमाई गई किसी अवधारणा को आजमाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसे पूरी तरह सिद्ध हो चुके विकल्प पर आंख मूंदकर तरजीह देना चिंता की बात है। रुड़की आईआईटी का प्रोफेशनल होने तथा रेलवे टेक्नोलॉजी का जीवनभर का अनुभव होने के अलावा न्यूक्लियर इंजीनियरिंग, ओशन थर्मल एनर्जी कनवर्जन जैसे विविध क्षेत्रों के अनुभव के साथ मैकेनिकल इलेक्ट्रिकल ट्रेन टेक्नोलॉजी दोनों क्षेत्रों में काम कर चुकने के कारण मेरा फर्ज है कि इस संबंध में सावधानी की कुछ बातें कहूं, जिनकी...
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ओर फैसला लेने से पहले ध्यान देना चाहिए।
टैल्गो ट्रेन लाने का घोषित उद्‌देश्य मौजूदा रेल कॉरिडोर पर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने का है, जिसके लिए दुनियाभर में ट्रेन सेट टेक्नोलॉजी अपनी अहमियत साबित कर चुकी है। इसका उपयोग भारतीय रेलवे की उपनगरीय सेवाओं में इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट्स (ईएमयू) तथा भारत सहित दुनियाभर की मेट्रो रेल सेवाओं में किया जा रहा है। जापान, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, चीन आदि सहित दुनियाभर में हाई स्पीड और सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों में इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है। भारत में मेट्रो रेलवे सिस्टम का व्यापक विस्तार होने के कारण अब पूरी तरह स्वदेशी ट्रेन सेट्स का निर्माण संभव है। रेलवे में मेरे पूर्व के वर्षों से लेकर मैंने देखा है कि 1980 से ही इस बारे में घोषणाओं के बावजूद कुछ गैर-तकनीकी बातों के कारण ट्रेन सेट्स का ट्रायल तक नहीं किया गया है। एनडीए के पिछले कार्यकाल के दौरान 2002 में इसकी घोषणा हुई, लेकिन उसे कभी अमल में नहीं लाया गया। यूपीए युग के लगभग सारे बजट भाषणों में ट्रेन सेट लाने का इरादा जाहिर किया गया, लेकिन बार-बार टेंडर जारी करने के बाद कैंसल कर दिए गए। वास्तविकता यह है कि भारतीय रेलवे की निर्माण इकाइयों के पास मौजूद संसाधनों को देखते हुए यह विश्वस्तरीय ट्रेन सेट बिना किसी बाहरी मदद के बहुत ही कम समय में बनाया जा सकता है।
सवाल है कि यह ट्रेन सेट है क्या? यह ईएमयू जैसी ट्रेनें ही होती हैं, जिनमें बिजली से खुद चलने वाले डिब्बों की यूनिट होती हैं। ईएमयू में किसी अलग लोकोमोटिव यानी इंजन की जरूरत नहीं होती, क्योंकि एक या अधिक डिब्बों में बिजली से चलने वाली ट्रैक्शन मोटर लगी होती हैं। टैल्गो ट्रेन कोच में सामान्य ट्रेन कोच में लगने वाले 8 पहियों की बजाय सिर्फ 4 पहिये होते हैं। फिर इसमें दो पहियों को जोड़ने वाला एक्सल भी नहीं होता। इस तरह एक ही बोगी के दो पहिये स्वतंत्र रूप से घूम सकते हैं। इन्हें एक स्टील फ्रेम जोड़कर रखती है। इसका द्वितीय सस्पेंशन एयर स्प्रिंग का बना होता है, जो कोच के गुरुत्व केंद्र के ऊपर स्थित होता है ताकि मोड़ पर झुकाव के जरिये संतुलन वाला बल लाया जा सके और मोड़ पर भी तेज रफ्तार कायम रह सके। इस तरह समान ट्रैक पर मौजूदा ट्रेनों से अधिक औसर रफ्तार हासिल की जाती है। विचार तो शानदार है, लेकिन इसमें कई सवाल हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।
पहली बात तो दुनिया की किसी भी अनुभवी रेल व्यवस्था में इसे आजमाया नहीं गया है यानी यह कसौटी पर खरी उतरी टेक्नोलॉजी नहीं है। चूंकि यह स्पेन की कंपनी है तो वहां यह उपयोग में लाई जा रही है, लेकिन वहां डिब्बों और यात्री ले जाने की क्षमता बहुत कम है, जबकि भारत में तो 22 मीटर लंबाई वाली 26 बोगियों की ट्रेन की जरूरत है। ट्रेल्गो कोच की लंबाई सिर्फ 13 मीटर है। अमेरिका, अर्जेंटीना और कजाकिस्तान में कुछ ट्रायल की खबरें हैं, लेकिन खबर है कि अर्जेंटीना में तो टेल्गो की जगह सीएनआर डेलियन रोलिंग स्टॉक लाई गई है और टेल्गो का भविष्य अनिश्चित है।
ट्रेन सेट टेक्नोलॉजी दुनियाभर में अपनी काबिलियत साबित कर चुकी है और भार में उपलब्ध है। वह अधिकतम गति पर बेहतर औसत के समान परिणाम देती है और मोड़ के अलावा भी रफ्तार के हर अवरोध पर अच्छे एक्सीलरेशन के कारण बेहतर समय निकालती है। टेल्गो पूरी एक ट्रेन मुफ्त क्यों दे रही है? वजह यह है कि भारतीय रेल न्यूनतम किराये के साथ दुनिया की सबसे बड़ी यात्री रेल सेवा है। यहां तक कि चीन में भी रेल किराया भारत की तुलना में तीन गुना ज्यादा है। संबंधित लोगों से अनौपचारिक चर्चा में पता चला कि चीन में सर्वोच्च स्तर पर निर्णय लिए जाते हैं, जिन्हें नीचे बता दिया जाता है। इस तरह वहां खरीद की सामान्य प्रक्रिया लागू नहीं होती। भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जमीनी स्तर पर साबित करके दिखाना होता है और विकास की संभावना भी यही है। अब सवाल यह है कि क्या हम कंपनी की इस दरियादिली विदेशी टेक्नोलॉजी से अभिभूत हो जाएंगे या नफा-नुकसान भी देखेंगे? बेशक एक ट्रेन आरडीएसओ द्वारा तय प्रोग्राम पर खरी उतरेगी। पहली कुछ यूनिट, जिनका रखरखाव स्पेनिश कंपनी पांच साल देखेगी, वह संभव है ज्यादा दिक्कत दें। समस्या तब शुरू होगी जब पांच साल बाद रख-रखाव भारतीय रेल के पास आएगा। डिजाइन की सरलता के सिद्धांत के विपरीत इसका तंत्र बहुत जटिल है और सावधानियां बहुत ज्यादा हैं, जिन्हें बनाए रखना कठिन होगा। तब तक इतनी देरी हो चुकी होगी कि आर्थिक रूप से इसे बदलना नामुमकिन हो जाएगा। यह कन्सेप्ट ट्रेन सेट पर लागू नहीं किया जा सकता। चूंकि ज्यादातर विकसित देशों में ट्रेन सेट टेक्नोलॉजी पर यात्री ट्रेनें चलाई जा रही हंै, भारत जैसे लंबी ट्रेनों के लिए इंजन से खींचे जाने वाली ट्रेन टेक्नोलॉजी विकसित नहीं हुई है। अब उल्टी दिशा में चलने के उत्साह में हम अपनी यात्री ट्रेनों में मालगाड़ी के कपलर्स का उपयोग कर रहे हैं। इसी कारण यात्रियों को झटके सहने पड़ते हैं, जिनसे दुनियाभर के यात्रियों को बचाया जाता है। फिर डिब्बे छोटे होने से ज्यादा डिब्बे लगाने पड़ंेगे तथा यह समस्या और बढ़ जाएगी। मेरी गुजारिश है कि कोई फैसला लेने के पहले ट्रेन सेट टेक्नोलॉजी का भी ट्रायल ले लिया जाए। खबरों के मुताबिक शायद टेल्गो को अन्य टेक्नोलॉजी से तुलना किए बिना अपना लिया जाएगा। कीमत की तुलना करना जरूरी है। मीडिया हाइप में शायद ऊपर बताए तकनीकी बिंदुओं की अनदेखी हो रही है, कृपया उन्हें भी आजमा लिया जाए और उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाए।
(येलेखक के अपने विचार हैं)
विजय कुमार दत्त
रेलवेबोर्ड के पूर्व सदस्य

2 posts - Tue Aug 30, 2016

  
821 views
Aug 30 2016 (23:56)
Proud atheist~   4435 blog posts   37 correct pred (63% accurate)
Re# 1976666-3            Tags   Past Edits
Hadd hai yaar ye mahashay khud ko itna gyani bata rahe hain aur inko ye bhi nahi pata ki CBC couplers k advantags kya hain..

  
1575 views
Aug 31 2016 (00:03)
Proud atheist~   4435 blog posts   37 correct pred (63% accurate)
Re# 1976666-4            Tags   Past Edits
And btw Argentina me talgo 4 use hone wali thi jo ki 80's ki train hai jabki India me talgo 9 ka trial hua jo ki latest model hai aur Russia me successfully operate ho rahi hain..

  
1130 views
Aug 31 2016 (12:32)
विश्व नाथ*   16774 blog posts   268 correct pred (76% accurate)
Re# 1976666-5            Tags   Past Edits
Jerks are not ignored, In reality IR failed to modify coupling even after many years of LHB introduction.
The original LHB coupling were pron to break midway, Many such incidents happened with first shatabdi who got first original rake for trial.

  
1199 views
Aug 31 2016 (12:34)
विश्व नाथ*   16774 blog posts   268 correct pred (76% accurate)
Re# 1976666-6            Tags   Past Edits
खुद को ज्ञानी नहीं अपनी शिक्षा और अनुभव बता रहे थे,
ज्ञानी तो यहाँ मिलते हैं जिनको मोदी जी ने आज तक पहचाना नहीं :D :D वरना रेल का भाला कब का हो गया होता.

  
1133 views
Aug 31 2016 (12:47)
Tabbys star and the Alien outpost~   2565 blog posts
Re# 1976666-7            Tags   Past Edits
The 'Freight couplers' that the author feels are 'backward' are more advanced than the couplers we use in our conventional trains. Only a few European countries and countries that were historically under British influence use screw couplers. Modern railways across the world use various types of CBC couplers ( some variants of which are used in IR's freight and passenger stock). And jerks are a problem with CBC rakes, something which has not not been fully controlled so far. While improvements have been made to the point where these are barely perceptible, the problem is a difficult one to control fully.
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